Share this…
• इकाई समय में तय की गई दूरी चाल कहलाता है। 


• इकाई समय में निश्चित दिशा में तय की गई दुरी वेग कहलाता है।

• सदिश राशियों को परिमाण और दिशा दोनों होते है, जबकि अदिश राशिओं में केवल परिमाण होता है।

• चाल एक अदिश राशि है, जबकि वेग एक सदिश राशि है।

• किसी वस्तु द्वारा निश्चित दिशा में स्थान परिवर्तन विस्थापन कहलाता है।

• विस्थापन शून्य हो सकता है लेकिन तय की गई दूरी शून्य नहीं होता है।

• वेग में प्रति इकाई समय में होने वाले परिवर्तन को उस पिण्ड का त्वरण कहते हे।

• त्वरण और विस्थापन दोनों ही सदिश राशियाँ है।

• न्यूटन के प्रथम गति नियम के अनुसार’कोई वस्तु गतिशील है, तो वह गतिशील और स्थिर है तो वह स्थिर ही रहना चाहती है। जब तक की उस पर कोई बाहरी बल कार्य न करे।!

• विराम के जड़त्व के कारण रूकी हुई गाड़ी को अकस्मात्‌ चलने से यात्री पीछे की ओर झुक जाता है।

• गति के जड़त्व के कारण चलती हुई गाड़ी को अचानक रूकने पर यात्री आगे की ओर झुक जाता है।

• विराम के जड़त्य के कारण डंडे से प्रहार करने पर कोट की धूल झड़ जाती हे।

• न्यूटन के प्रथम गति नियम से जल की परिभाषा प्राप्त होती है।

• बल वह भौतिक कारण है जो किसी वस्तु पर लगकर उसकी अवस्था में परिवर्तन लाता है या लाने की चेष्ठा करता है।

किसी पिण्ड द्वारा इकाई समय में ध्रुवान्तर पर बनाया गया कोण कोणीय वेग कहलाता है।

• कोणीय वेग का मात्रक रेडियन प्रति सेकेण्ड होता है।

• न्‍यूटन के प्रथम गति नियम को जडंत्व का नियम या गैलिलियो का नियम भी कहते है।

• किसी वस्तु के मात्रा और वेग के गुणनफल को संवेग कहते है।

• न्यूटन के द्वितीय गति नियम के अनुसार“किसी वस्तु के संबेग में परिवर्तन की दर उस वस्तु पर आरोपित बल के समनुपाती तथा द्रव्यमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है, और त्वरण की दिशा बल की दिशा में होती है।’

• न्यूटन के द्वितीय गति नियम से बल का व्यंजक प्राप्त होता है।

• यदि कोई बल किसी वस्तु पर बहुत ही कम समय तक कार्यरत रहे तो बल और समय के गुणनफल को उस वस्तु का आबेग कहते है।


• जिस बल का परिणामी शून्य नही होता हैं उसे असंतुलित बल कहा जाता है।

• न्यूटन के तृतीय गति नियम के अनुसार’ प्रत्येक क्रिया के बराबर, परन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।’

संवेग संरक्षण के सिद्धांत के अनुसार यदि कणों के किसी समूह पर कोई बाह्य बल नहीं लग रहा हो तो उस निकाय का कुल संवेग अपरिवर्तित रहता है।

• अभिकेन्द्री बल में, वस्तु वृताकार मार्ग पर चलती है, तो उस पर बल, बृत के केन्द्र की ओर से कार्य करता है।

अपकेन्द्री बल में प्रतिक्रिया बल वृताकार पथ पर चलायमान वस्तु द्वारा अन्य वस्तु पर लगता है।

• पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना तथा इलेक्ट्रॉन का नाभिक के चारों ओर घूमना अभिकेन्द्रीय बल का उदाहरण है।

कपड़ा सुखाने की मशीन तथा दूध से मक्खन निकालने वाली मशीन अपकेन्द्रीय बल के सिद्धांत पर कार्य करता है।

• बल द्वारा एक पिण्ड को एक अक्ष के परितः घूमने की प्रवृति को बल आधूर्ण कहते है।

बल आधूर्ण एक सदिश राशि है और इसका मात्रक न्यूटन मी० होता है।

• किसी पिण्ड का भार वह बल हे, जिससे पृथ्वी उसे अपने केन्द्र की ओर खींचती है।

• जब बल द्वारा किसी वस्तु में विस्थापन उत्पन्न किया जाता है, तो इसे कार्य होना समझा जाता है।

• कार्य की माप लगाए गए बल तथा बल की दिशा में वस्तु के बिस्थापन के गुणनफल के बराबर होता है।

कार्य करने की दर शक्ति कहलाता है जबकि कार्य करने की क्षमता उर्जा कहलाता है।

• कार्य और ऊर्जा का मात्रक जूल है, जबकि शक्ति का मात्रक याट है।

उँचाई पर स्थित वस्तु, स्प्रिंग, बाँध बनाकर रोके गए जल आदि में स्थितिज उर्जा होती है।

• घड़ी की चाभी में संचित ऊर्जा स्थितिज होती है।

ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार “ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है ओर न ही नष्ट की जा सकती है।”

• एक अश्व शक्ति 746 वाट के बराबर होता है।

• वह न्यूनतम बेग जिसमे प्रक्षेपित करने पर कोई पिण्ड पृथ्वी के गुरूत्वीय क्षेत्र से बाहर निकल जाये, उसे पलायन बेग कहते है।

• चन्द्रमा पर 2 का मान पृथ्वी के g का 1/6 गुणा होता है।

• पृथ्वी के लिए पलायन वेग का मान 11.2 किमी०/से० होता है, जबकि सौरमंडल के लिए पलायन बेग 42 किमी०/से० होता है तथा चन्द्रमा का 2.4 किमी०/से०।

• भूस्थिर उपग्रह का घुर्णण काल 24 घंटे के तुल्य होता है, तथा वह पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर दिखाई देता है।

दाव का SI मात्रक न्यूटन/वर्ग मीटर या पास्कल होता है।

• वायुदाब मापी (बैरोमीटर) का पारा का अचानक बढ़ जाना यह सूचित करता है कि मौसम स्वच्छ रहेगा।

• पृष्ठ तनाव के कारण वर्षा की बुंदें गोलाकार तथा शेविंग ब्रश को जल से निकालने पर इसके केश आपस में सटे रहते है।

• केशिकत्व के कारण लालटेन की बत्ती में तेल ऊपर चढ़ता है।

ब्लॉटिंग पेपर से स्याही का सुखाया जाना भी केशिकत्व के कारण होता है।

• ध्वनि तरंगे अनुदेर्ध्य तरंग का उदाहरण है, जबकि प्रकाश तरंगे अनुप्रस्थ तरंगे होती है।

आवृति को Hz ( हर्ट्ज) में मापा जाता है।

• ध्वनि का बेग हवा में 332 m/s, जल में 1483 m/s तथा लोहे में 5130 m/s होता है।

ध्वनि का बेग पर दाब का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

• ध्वनि की चाल तरंगदैध्य एवं आयाम पर निर्भर नहीं करती है।

• एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाने पर ध्यनि की आवृत्ति नहीं बदलती है।

• 20 Hz से नीचे की आवृत्ति वाले ध्यमि तरंगों को अवश्नव्य तथा 20Hz से 20000Hz के बीच की आवृत्ति बाले तरंगो को श्रव्य तरंगे कहा जाता है।

20000Hz से उपर के तरंगों को पराश्रय्य तरंगे कहा जाता है।

• ॥ 20Hz से 20000Hzके बीच के तरंगो को मानव कान सून सकता है।

• कुत्ता, बिल्ली एवं अमगादड़ आदि 20000Hz से उपर की तरंगों को सून सकते है।

• पराश्रव्य तरंगों का प्रयोग समुद्र की गहराई, ट्यूमर का पत्ता लगाने, बायुयान तथा घडियों के पूर्जों को साफ करने में किया जाता है।

प्रतिध्वनि सुनने के लिए श्रोता एवं परावर्तक सतह के बीच कम-से-कम 17 मी० की दूरी होनी चाहिए।

• लोलक का आवर्त्तकाल लोलक के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।

• कान पर ध्वनि का प्रभाव 1/10 सेकेण्ड तक रहता है।

• Cp-Cv = R मेयर सूत्र के नाम से जाना जाता है।

Share this…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *