MPGK सुपर नोट्स – मध्यप्रदेश की मृदा

Tez Education By Tez Education February 8, 2026

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मध्य प्रदेश की मृदा संपदा

मध्य प्रदेश की मृदा (मिट्टियाँ)

राज्य की भौगोलिक संरचना और कृषि का आधार

सामान्य परिचय

मृदा पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है, जिसमें कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ पाए जाते हैं। मध्य प्रदेश, भारत के दक्षिण पठार का हिस्सा है और यहाँ चट्टानों के अपक्षय (Weathering) व अपरदन के परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की मिट्टियों का विकास हुआ है।

  • निर्माण: चट्टानों के तत्वों और जैविक पदार्थों से
  • प्रभाव: वनस्पति और फसलों का निर्धारण
  • प्रकृति: बैक्टीरिया और जल प्रणाली द्वारा निर्धारित

मृदा वितरण (प्रतिशत में)

प्रमुख मिट्टियों का विवरण

काली मिट्टी

43.44%

अन्य नाम: रेगुर, कपासी, करेल, चेरनोजम

निर्माण: बेसाल्ट चट्टानों से
विस्तार: मालवा, नर्मदा घाटी, सतपुड़ा
फसलें: सोयाबीन, कपास, गेहूँ
विशेषता: सूखने पर दरारें पड़ जाती हैं (स्वतः जुताई वाली मृदा)।

लाल-पीली मिट्टी

33%

अन्य नाम: चलका, डोरसा

निर्माण: आर्कियन, गोंडवाना शैल
विस्तार: बघेलखंड (मण्डला, बालाघाट)
फसलें: धान (सर्वाधिक उपयुक्त)
विशेषता: फेरिक ऑक्साइड के कारण लाल और जलयोजन से पीला रंग।

मिश्रित मृदा

10%

मिश्रण: लाल-पीली और काली मृदा

विस्तार: बुंदेलखंड, रीवा-पन्ना पठार
फसलें: मोटा अनाज, अलसी, तिल
उपयोगिता: मोटे अनाज की खेती के लिए प्रसिद्ध।

जलोढ़ मृदा

3%

अन्य नाम: दोमट मिट्टी

निर्माण: नदियों के अवसादों से
विस्तार: चंबल क्षेत्र (भिंड, मुरैना)
फसलें: गेहूँ, गन्ना, सरसों
विशेषता: फसलों के विकास हेतु सर्वाधिक अनुकूल और उपजाऊ।

लेटेराइट मृदा

2.5%

अन्य नाम: भाटा, लाल बलुई, केओलिन

निर्माण: निक्षालन (Leaching) क्रिया से
विस्तार: छिंदवाड़ा, बालाघाट, बैतूल
फसलें: कॉफ़ी, चाय, बाजरा
विशेष: बैतूल के ‘कुकरू ग्राम’ में 110 हेक्टेयर पर कॉफ़ी उत्पादन।

मृदा अपरदन: “रेंगती हुई मृत्यु”

मृदा अपरदन से ऊपरी उपजाऊ सतह बह जाती है, जिससे भूमि अनुपजाऊ हो जाती है। चंबल घाटी इसका सबसे विकराल उदाहरण है।

अवनालिका अपरदन (Gully Erosion) चंबल नदी द्वारा निर्मित खड्ड (Ravines) लगभग 6 लाख एकड़ भूमि को प्रभावित कर चुके हैं।
ताप्ती नदी का प्रभाव बैतूल के ‘भैंसदेही’ क्षेत्र में भी अवनालिका अपरदन देखा गया है।

मिट्टी बचाओं आंदोलन

वर्ष: 1977

कारण: तवा जलाशय के कारण उत्पन्न ‘जलाक्रांत’ (Water-logging) समस्या के विरोध में शुरू हुआ था।

संरक्षण के उपाय:

  • कंटूर खेती (Contour Farming)
  • वेदिका बांध (Terrace Bunding)
  • मेड़बंदी (Bunding)
  • व्यापक वृक्षारोपण

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