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कोल जनजाति मध्य प्रदेश की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है, जिसका मुख्य संकेन्द्रण बघेलखंड तथा विंध्य क्षेत्र के रीवा, सतना, सीधी, शहडोल, सिंगरौली और जबलपुर जिलों में है। उज्जैन मालवा क्षेत्र में स्थित है और यह कोल जनजाति का प्रमुख केंद्र नहीं है।
गोंड जनजाति की प्रमुख उपजातियों में राजगोंड, अगरिया (लोहा गलाने वाले), प्रधान (पुजारी व वंशावली गायक), ओझा (तांत्रिक), सोल्हाश (बढ़ई) तथा दातोलिया आदि शामिल हैं। जबकि संतिया (Santia) एक अलग खानाबदोश जनजाति है जो स्वयं को राजपूत मूल का मानती है।
भारिया जनजाति मुख्य रूप से छिंदवाड़ा (पातालकोट), जबलपुर और सिवनी जिलों में निवास करती है। यह जनजाति पारंपरिक रूप से वनोपज संग्रहण, बांस शिल्पकला और कृषि मजदूरी में संलग्न है।
बैगा जनजाति में दशहरा उत्सव के समय ‘दशहरा नृत्य’ या प्रेम प्रसंग आधारित विशेष परंपरा होती है, जिसमें कुंवारी बैगा युवतियाँ दूसरे गाँव में जाकर नृत्य करती हैं और अपनी पसंद के युवक का विवाह हेतु चयन करती हैं।
प्रधान, सोलहास, ओझान (ओझा), अगरिया आदि गोंड जनजाति से संबंधित वंशज व उप-शाखाएँ हैं। जबकि कोरकू एक स्वतंत्र ऑस्ट्रो-एशियाटिक (कोलारियन) भाषा परिवार की जनजाति है, जो मुख्य रूप से सतपुड़ा क्षेत्र (बैतूल, हरदा, खंडवा, बुरहानपुर) में निवास करती है।
‘भील’ शब्द की उत्पत्ति द्रविड़ भाषा के ‘बील’ या ‘विल्लु’ से हुई है, जिसका अर्थ ‘धनुष’ होता है। भील जनजाति तीरंदाजी और गुरिल्ला (छापामार) युद्ध कौशल के लिए ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध है। टंट्या भील और भीमा नायक जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी इसी जनजाति से संबंधित थे।
पनिका जनजाति मध्य प्रदेश के विंध्य-बघेलखंड (सीधी, शहडोल, अनूपपुर) क्षेत्र में पाई जाने वाली एक छोटी किंतु विशिष्ट जनजाति है। यह मुख्य रूप से वस्त्र बुनाई का कार्य करती है तथा कबीरपंथी परंपरा का पालन करने के कारण ‘कबीरहा’ भी कहलाती है।
संतिया जनजाति मध्य प्रदेश में एक खानाबदोश (घुमंतू) जनजातीय समुदाय है। यह जनजाति स्वयं को राजपूत योद्धा वंश का वंशज मानती है तथा मालवा व निकटवर्ती क्षेत्रों में भ्रमणशील जीवन व्यतीत करती है।
भील, गोंड और बैगा मध्य प्रदेश की प्रमुख जनजातियाँ हैं। जबकि ‘कोम’ (Kom) जनजाति पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर राज्य की एक प्रमुख जनजाति है।
सहरिया जनजाति मध्य प्रदेश की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है। यह मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी जिलों जैसे श्योपुर, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, शिवपुरी और गुना में निवास करती है तथा मुख्य रूप से कृषि व मजदूरी पर आश्रित है।
संतिया जनजाति मध्य प्रदेश की एक खानाबदोश जनजाति है, जिसकी उत्पत्ति राजपूत योद्धाओं से मानी जाती है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से स्थायी निवास न बनाकर भ्रमणशील जीवन शैली अपनाता है।
पातालकोट मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले की तामिया तहसील में घोड़े की नाल के आकार की एक गहरी घाटी है। यहाँ की लगभग 90% से अधिक आबादी भारिया जनजाति की है। 1981 की जनगणना में भारिया जनजाति को ‘जंगलियों के जंगली’ कहा गया था।