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मध्य प्रदेश में नर्मदा घाटी कृषि गतिविधियों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और उपजाऊ क्षेत्र है। इस घाटी में गहरी व उपजाऊ काली मिट्टी पाई जाती है तथा प्रचुर जल उपलब्धता के कारण यहाँ गेहूं, चना, सोयाबीन आदि फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है।
मध्य प्रदेश में अनुबंध कृषि (Contract Farming) कानूनी रूप से अनुमत और प्रोत्साहित है। इसके तहत किसानों और प्रायोजकों/कंपनियों के बीच फसल के पूर्व-निर्धारित मूल्य और गुणवत्ता मानकों के आधार पर समझौता होता है, जिससे किसानों को बाजार जोखिम से सुरक्षा और निवेशकों को गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पाद प्राप्त होते हैं।
कपास (Cotton) मध्य प्रदेश की एक प्रमुख नकदी/व्यावसायिक फसल है। इसका उत्पादन मुख्य रूप से पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा एवं निमाड़ क्षेत्र (खंडवा, खरगोन आदि) में होता है, जहाँ काली कपासी मिट्टी प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। निमाड़ क्षेत्र को ‘सफेद सोने का क्षेत्र’ भी कहा जाता है।
मध्य प्रदेश में स्थानांतरित कृषि या स्लैश-एंड-बर्न (झूम खेती) को ‘बिवार’ (Bewar) कहा जाता है। यह पद्धति मुख्य रूप से बैगा जनजाति द्वारा अपनाई जाती रही है। बैगा जनजाति के लोग इसे अपनी पारंपरिक कृषि पद्धति मानते हैं।
मध्य प्रदेश को कृषि विभाग और योजना आयोग के अनुसार कुल 11 कृषि जलवायु क्षेत्रों (Agro-Climatic Zones) में विभाजित किया गया है। इनमें छत्तीसगढ़ का मैदान, विंध्य पठार, मध्य नर्मदा घाटी, मालवा पठार, निमाड़ मैदान, गिर्र्द क्षेत्र, बुंदेलखंड आदि शामिल हैं।
मध्य प्रदेश में कुल 11 कृषि जलवायु क्षेत्र (Agro-Climatic Zones) मान्य हैं। (नोट: 11 कृषि-जलवायु क्षेत्र मूलतः राज्य कृषि विभाग एवं योजना आयोग का वर्गीकरण है, जिसे प्रश्न में जनगणना के संदर्भ में पूछा गया है। मध्य प्रदेश में आधिकारिक रूप से 11 कृषि-जलवायु क्षेत्र ही हैं।)
मध्य प्रदेश भारत में दलहन और विशेष रूप से चना उत्पादन में शीर्ष स्थान पर रहा है। वर्ष 2017-18 के कृषि आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश का भारत के कुल चना उत्पादन में योगदान लगभग 40% (35-40% से अधिक) रहा है, अतः आधिकारिक उत्तर विकल्प D है।
मध्य प्रदेश भारत में लहसुन और धनिया के उत्पादन में अग्रणी राज्य है। राज्य का गुना जिला धनिया उत्पादन एवं मंडी के लिए प्रसिद्ध है, जबकि मंदसौर, रतलाम और नीमच जिले लहसुन के प्रमुख उत्पादक केंद्र हैं।
मध्य प्रदेश सरकार ने बड़े पैमाने पर कृषि-निवेश और आधुनिक कृषि परियोजनाओं को आकर्षित करने के लिए गैर-वन बंजर भूमि (Non-forest wastelands) को दीर्घकालिक पट्टे पर आवंटित करने की नीति बनाई है, जिससे पर्यावरण और उपजाऊ भूमि को क्षति पहुँचाए बिना बंजर भूमि का सदुपयोग हो सके।