MP Varg 3 प्रीवियस पेपर -22 (हिन्दी एवं पैडागौजी)

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म.प्र. शिक्षक पात्रता परीक्षा वर्ग-3 स्पेशल

म.प्र. शिक्षक पात्रता परीक्षा वर्ग-3 स्पेशल

वर्ष 2022 में आयोजित कुल पेपर संख्या-40

विषय: भाषा-१ हिन्दी एवं शिक्षण शास्त्र

कुल प्रश्न: 30 | पेपर नं.: 22/40

Exam Date: Varg 3 Hindi 15-3-2022 Shift-2.docx

Exam से पहले अपनी तैयारी का लेवल जांचें

निर्देश: गद्यांश (प्रश्न सं. 31 से 53)

“तानाशाह जनमानस के जागरण को कोई महत्त्व नहीं देता। उसका निर्माण ऊपर से चलता है, किंतु यह लादा हुआ भार-स्वरूप निर्माण हो जाता है। सच्चा राष्ट्र-निर्माण वह है, जो जनमानस की तैयारी पर आधारित रहता है। योजनाएं शासन और सत्ता बनाएं, उन्हें कार्यरूप में परिणत भी करें; किंतु साथ-साथ उन्हें चिर-स्थायी बनाए रखने एवं पूर्णतया उद्देश्य-पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि जनमानस उन योजनाओं के लिए तैयार हो। स्पष्ट शब्दों में हम कह सकते हैं, कि सत्ता राष्ट्र-निर्माण रूपी फसल के लिए हल चलाने वाले किसान का कार्य तो कर सकती है, किंतु उसे भूमि जनमानस को ही बनानी पड़ेगी। अन्यथा फसल या तो हवाई होगी या फिर गमलों की फसल होगी; जैसा आजकल ‘अधिक अन्न उपजाओ’ आंदोलन के कर्णधार भारत के मंत्रिगण कराया करते हैं। इस फसल को किस-किस बुभुक्षित के सामने रखेगी शासन-सत्ता? यह प्रश्न मस्तिष्क में चक्कर ही काटा करता है। इस विवेचन से हमने राष्ट्र-निर्माण में जनमानस की तैयारी का महत्त्व पहचान लिया है। यह जनमानस किस प्रकार तैयार होता है? इस प्रश्न का उत्तर आपको समाचार पत्र देगा। निर्माण-काल में यदि समाचार-पत्र सत्समालोचना से उतरकर ध्वंसात्मक हो गया तो निश्चित रूप से वह कर्तव्यच्युत हो जाता है, किंतु सत्समालोचना निर्माण के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितना निर्माण का समर्थन। जनमानस को तैयार करने के लिए समाचार-पत्र किस नीति को अपनाएं? यह प्रश्न अपने में एक विवाद लिए हुए है; क्योंकि भिन्न-भिन्न समाचार-पत्र भिन्न-भिन्न नीतियों को उद्देश्य बनाकर प्रकाशित होते हैं। यहाँ तक कि राष्ट्र-निर्माण की योजनाएं भी उनके मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न होती हैं।”

निर्देश: काव्यांश (प्रश्न सं. 54 से 60)

“ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम,
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
तेरे उर में शायित गांधी, बुद्ध औ’ राम,
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक,
तेरे चरण चूमता सागर,
श्वासों में हैं वेद-ऋचाएं
वाणी में है गीता का स्वर।
ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम।
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
हरे-भरे हैं खेत सुहाने,
फल-फूलों से युत वन-उपवन,
तेरे अंदर भरा हुआ है
खनिजों का कितना व्यापक धन।
मुक्त-हस्त तू बांट रही है सुख-संपत्ति, धन-धाम।
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।”

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