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म.प्र. शिक्षक पात्रता परीक्षा वर्ग-3 स्पेशल
वर्ष 2022 में आयोजित कुल पेपर संख्या-40
विषय:- भाषा-१ हिन्दी एवं शिक्षण शास्त्र
कुल प्रश्न संख्या-30
पेपर नं.-25/40
Exam Date:- Varg 3 Hindi 17-3-2022 Shift-1
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निर्देश: गद्यांश
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (1 से 6) के उत्तर दीजिए:
आरंभ में मानवतावाद मानवता को शोषण और बंधन मुक्त करने के लिए महान और उदार आदर्शों से चालित हुआ था। तत्वचिंतकों और साहित्य मनीषियों के मन में इस आदर्श का रूप बहुत ही उदार था, पर व्यवहार में मनुष्य की उदारता केवल एक सीमा तक प्रगतिशील विचारों की ही उपज थी। हमारे देश में भी नये जीवन-साहित्य के स्पर्श से नवीन जीवन-आदर्श जाग पड़े। मानवतावाद भी आया, दलितों, अधः पतितों और उपेक्षितों के प्रति सहानुभूति का भाव भी आया; और साथ-साथ राष्ट्रीयता भी आई। पश्चिमी देशों में राष्ट्रीय भावना के बहुल प्रचार ने एक राष्ट्र के भीतर सुविधाभोगी और सुविधा के जुटाने वाले दो वर्गों के व्यवधान को बढ़ाने में सहायता पहुँचाई। जिन लोगों के पास संपत्ति है और जिनके पास संपत्ति नहीं है, उनका अंतर भयंकर होता गया। एक तरफ तो विषमता बढ़ती गई और दूसरी तरफ राष्ट्रीयता की देवी युवावस्था की देहली पर पहुँच कर ऐसी विकृत हुई कि उसने मानवता को ही उतार दिया। इस प्रकार मनुष्यता की महिमा भी विकृत रूप में भयंकर हो उठी।
निर्देश: काव्यांश
काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (7 से 12) के उत्तर दीजिए:
मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में। तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में॥
तू आह बन किसी की, मुझको पुकारता था। मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में॥
मेरे लिए खड़ा था, दुखियों के द्वार पर तू। मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में॥
बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू। आँखें लगी थी मेरी, तब मान और धन में॥
बाजे बजा-बजा कर, मैं था तुझे रिझाता। तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में॥
मैं था विरक्त तुझसे, जग की अनित्यता पर। उत्थान भर रहा था, तब तू किसी पतन में॥
बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था। मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में॥
तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं। तू कर्म में मगन था, मैं व्यस्त था कथन में॥
तेरा पता सिकंदर को, मैं समझ रहा था। पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में॥
तू आह बन किसी की, मुझको पुकारता था। मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में॥
मेरे लिए खड़ा था, दुखियों के द्वार पर तू। मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में॥
बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू। आँखें लगी थी मेरी, तब मान और धन में॥
बाजे बजा-बजा कर, मैं था तुझे रिझाता। तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में॥
मैं था विरक्त तुझसे, जग की अनित्यता पर। उत्थान भर रहा था, तब तू किसी पतन में॥
बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था। मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में॥
तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं। तू कर्म में मगन था, मैं व्यस्त था कथन में॥
तेरा पता सिकंदर को, मैं समझ रहा था। पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में॥
शिक्षाशास्त्र एवं व्याकरण (Pedagogy & Grammar)