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म.प्र. शिक्षक पात्रता परीक्षा वर्ग-3 स्पेशल
वर्ष 2022 में आयोजित कुल पेपर संख्या-40
विषय:- भाषा-१ हिन्दी एवं शिक्षण शास्त्र
कुल प्रश्न संख्या-30 | पेपर नं.-29/40
Exam Date:- Varg 3 Hindi 20-3-2022 Shift-1.docx
शीलयुक्त व्यवहार मनुष्य की प्रकृति और व्यक्तित्व को उद्घाटित करता है। उत्तम, प्रशंसनीय और पवित्र आचरण ही शील है। शीलयुक्त व्यवहार प्रत्येक व्यक्ति के लिए हितकर है। इससे मनुष्य की ख्याति बढ़ती है। शीलवान् व्यक्ति सबका हृदय जीत लेता है। इससे शंका और सन्देह की स्थितियाँ कभी उत्पन्न नहीं होतीं। इससे ऐसा सुखद वातावरण सृजित होता है जिसमें सभी प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। शीलवान् व्यक्ति अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को सुप्रभावित करता है।
अधिकारी-अधीनस्थ, शिक्षक-शिक्षार्थी, छोटों-बड़ों आदि सभी के लिए शीलयुक्त व्यवहार समान रूप से आवश्यक है। शिक्षार्थी में शील का अभाव है तो वह अपने शिक्षक से वांछित शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता। शीलवान् अधिकारी या कर्मचारी में आत्मविश्वास की वृद्धि स्वतः ही होने लगती है और साथ-ही-साथ उसके व्यक्तित्व में शालीनता आ जाती है। इस अमूल्य गुण की उपस्थिति में अधिकारी वर्ग और अधीनस्थ कर्मचारियों के बीच, शिक्षकगण और विद्यार्थियों के बीच तथा शासक और शासित के बीच मधुर एवं प्रगाढ़ सम्बन्ध स्थापित होते हैं। इस गुण के माध्यम से छोटे-से-छोटा व्यक्ति बड़ों की सहानुभूति अर्जित कर लेता है।
शील कोई दुर्लभ और दैवी गुण नहीं है। इस गुण को अर्जित किया जा सकता है। पारिवारिक संस्कार इस गुण को विकसित और विस्तारित करने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं। मूल भूमिका तो व्यक्ति स्वयं अदा करता है। चिंतन, मनन, सत्संगति एवं सतत अभ्यास से इसका विकास होता है। सुसंस्कृत मनुष्य के चरित्र का यह शील अभिन्न अंग है। यह गुण मनुष्य को सच्चे अर्थों में मानव बनाता है। इस अमूल्य गुण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्त्तव्य है।
यहाँ न मधु विहगों में गुंजन,
जीवन का संगीत बन रहा
यहाँ अतृप्त हृदय का रोदन।
यहाँ नहीं शब्दों में बँधती
आदर्शों की प्रतिमा जीवित,
यहाँ व्यर्थ है चित्र गीत में
सुंदरता को करना संचित।
यहाँ धरा का मुख कुरूप है,
कुत्सित गर्हित जन का जीवन,
सुंदरता का मूल्य वहाँ क्या
जहाँ उदर है क्षुब्ध, नग्न तन?
जहाँ दैन्य जर्जर असंख्य जन
पशु-जघन्य क्षण करते यापन,
कीड़ों-से रेंगते मनुज शिशु,
जहाँ अकाल वृद्ध है यौवन!
सुलभ यहाँ रे कवि को जग में
युग का नहीं सत्य शिव सुंदर,
काँप काँप उठते उसके उर की
व्यथा विमूर्छित वीणा के स्वर।