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शिक्षक पात्रता परीक्षा वर्ग-3
16 Nov. 2024, Shift-2 | हिन्दी
गद्यांश (प्रश्नों के लिए निर्देश)
वैवाहिक जीवन विश्वास की नींव पर अवलम्बित होता है। यह एक कटु सत्य है कि विवाह-पूर्व प्रेम-प्रसंग आम हो गए हैं। इसलिए उनके आधार पर वैवाहिक जीवन में कलुषता का संचार होना उचित नहीं है। बहुत से व्यक्ति विवाह-पूर्व प्रेम-प्रसंगों के कारण अपने साथी के साथ बुरा व्यवहार करते हैं। वास्तविकता ये है कि समाज में प्रत्येक क्षेत्र में महत्वकांक्षा बलवती है। कोई अपनी स्थिति से सन्तुष्ट नहीं है। फिल्मों के प्रभाव में लड़के-लड़किया अत्यधिक आकर्षक व्यक्तित्व वाला साथी विवाह हेतु चाहते हैं तथा जब वह नहीं मिलता, तो विवाह के पश्चात् जीवन में एक शून्य पैदा हो जाता है। इस शून्य को भरने की प्रवृत्ति से विवाहोत्तर सम्बन्ध स्थापित होते हैं। भारत में विवाहेत्तर सम्बन्धों की संख्या पहले की तुलना में तेजी से बढ़ी है। महानगरों में यह प्रवृत्ति ज्यादा दर्शनीय है क्योंकि आपाधापी के जीवन में पति-पत्नी एक-दूसरे को पर्याप्त समय नहीं दे पाते तथा अपने सहकर्मियों के साथ उनका लगाव हो जाता है। कई बार पति-पनी बिना वजह एक-दूसरे पर सन्देह करने लगते हैं। इससे टकराव पैदा होता है। पति-पत्नी में शारीरिक सन्तुष्टि का सर्वाधिक महत्व है। हार्दिक प्यार के साथ यौन असन्तुष्टि के कारण भी आज अनेक परिवार बिखर रहे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि पति-पली वैवाहिक जीवन की सीमाओं, आवश्यकताओं को समझें। तभी उनका जीवन सुखमय हो सकेगा।
काव्यांश (प्रश्नों के लिए निर्देश)
तुम भारत, हम भारतीय है, तुम माता, हम बेटे
किसकी हिम्मत है कि तुम्हें दृष्टता-दृष्टि से देखे ?
ओ माता, तुम एक अरब से अधिक भुजाओंवाली,
सबकी रक्षा में तुम सक्षम, हो अदम्य बलशाली।।
भाषा, वेश, प्रदेश भिन्न हैं, फिर भी भाई-भाई
भारत की साझी संस्कृति में पलते भारतवासी।
सुदिनों में हम एक साथ हँसते, गाते, सोते है,
दुर्दिन में भी साथ-साथ जगते पौरूष ढोते हैं।।
तुम हो शस्यश्यामला, खेतों में तुम लहराती हो,
प्रकृति प्राणमपि, सामगानमयि, तुम न किसे भाती हो।
तुम न अगर होती तो धरती वसुधा क्यों कहलाती ?
गंगा कहाँ बहा करती, गीता क्यों गाई जाती ?
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