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शिक्षक पात्रता परीक्षा वर्ग-3
दिनांक: 23 Nov. 2024, Shift-2 | विषय: भाषा- हिन्दी
विद्वान नम्रता को स्वतंत्रता की जननी मानते हैं। साधारण लोग भ्रमवश अहंकार को उसकी माता मानते हैं, वास्तव में वह विमाता है। आत्म संस्कार हेतु स्वतंत्रता आवश्यक है। मर्यादापूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिए आत्मनिर्भरता जरूरी है। आत्म मर्यादा हेतु आवश्यक है कि हम बड़ों से सम्मानपूर्वक, छोटों और बराबर वालों के साथ कोमलता का व्यवहार करें। युवाओं को याद करना चाहिए कि उनका ज्ञान कम है। वे अपने लक्ष्य से पीछे हैं तथा उनकी आकांक्षाएँ उनकी योग्यता से अधिक हैं। हम और जो कुछ भी हमारा है, सब हमसे नम्र रहने की आशा करते हैं। नम्रता का अर्थ निश्चय तथा दूसरों का मुँह ताकना नहीं है। इससे तो प्रज्ञा मंद पड़ जाती है। संकल्प क्षीण होता है, विकास रूक जाता है तथा निर्णय क्षमता नहीं आती। मनुष्य को अपना भाग्य विधाता स्वयं होना चाहिए। अपने फैसले तुम्हें स्वयं ही करने होंगे। विश्वासपात्र मित्र भी तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं ले सकता। हमें अनुभवी लोगों के अनुभवों से लाभ उठाना चाहिए। लेकिन हमारे निर्णयों तथा हमारे विचारों से ही हमारी रक्षा व पतन होगा। हमें नजरें तो नीचे रखनी हैं लेकिन रास्ता भी देखना है। हमारा व्यवहार कोमल तथा लक्ष्य उच्च होना चाहिए। संसार में हरिशचंद्र और महाराणा प्रताप जैसे अनेक महापुरूष हुए हैं। जिन्होंने आजीवन कष्ट उठाए लेकिन सत्य और मर्यादा नहीं छोड़ी। हरिशचंद्र की प्रतिज्ञा थी “चंद्र टरे, सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार। पै दृढ़ श्री हरिशचंद्र को, टरे न सत्य विचार।” महाराणा प्रताप की स्त्री और बच्चे भूख से तड़पते आजीवन जंगलों में भटकते रहे लेकिन स्वतंत्रता नहीं छोड़ी। एक बार एक युवक राजनीतिज्ञ बलवाइयों के हाथ पड़ गया। बलवाइयों ने उससे व्यंग्यपूर्वक पूछा कि उसका किला कहाँ है तो उसने अपने हृदय पर हाथ रखकर कहा, ‘यहां’? ज्ञान का गढ़ भी यही है। जो युवक सदा बातों में दूसरों का सहारा लेते हैं उनके आत्म संस्कार उन्नति नहीं कर सकते। उन्हें स्वयं विचार करना तथा अपने निश्चय पर दृढ़ रहना चाहिए। दूसरों की बातों को तो समझना चाहिए, उनका अंधभक्त नहीं बनना चाहिए। तुलसीदास जी की सर्वप्रियता, कीर्ति तथा शांतिमय दीर्घ जीवन उनकी मानसिक स्वतंत्रता, निर्द्वद्वता और आत्मनिर्भरता के कारण ही था। उनके समकालीन केशवदास जो विलासी राजाओं की कठपुतली बने रहे, दुर्गति को प्राप्त हुए। मनुष्य और दास में यही अंतर है। इसे स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता अथवा स्वावलंबन कुछ भी कह सकते है।
अगर उन्हें आवाज मिले तो
क्या बोलेंगे फूल,
सबसे पहले वह बोलेंगे
हमें तोड़ना भूल।
अगर उन्हें उड़ना आ जाता
काँटा क्या कर पाते,
मधुमक्खी सा डंक चुभोकर
सबको मजा चखाते।
अगर भागना उनको आता
पौधे ये कर जाते,
आता हुआ देख दुश्मन को
झट से रेस लगाते।