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शिक्षक पात्रता परीक्षा वर्ग-3
1 Nov. 2024, Shift-1 | विषय: भाषा- हिन्दी
✅ सही: 0
❌ गलत: 0
20:00
निर्देश: नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नो के सबसे उचित उत्तर वाले विकल्प का चयन कीजिए-
आदिकाल से ही मनुष्य के लिए सबसे समीप मनुष्य है। हम जिसके सुख-दुःख, हंसने-रोने का मर्म समझ सकते हैं, उसी से हमारी आत्मा का अधिक मेल होता है। विद्यार्थी को विद्यार्थी-जीवन से, कृषक को कृषक-जीवन से जितनी रूचि है, उतनी अन्य जातियों से नहीं, लेकिन साहित्य-जगत् में प्रवेश पाते ही यह भेद, यह पार्थक्य मिट जाता है। हमारी मानवता जैसे विशाल और विराट होकर समस्त मानव जाति पर अधिकार पा जाती है। मानव जाति ही नहीं चर और अचर, जड़ और चेतन सभी उसके अधिकार में आ जाते हैं। उसे मानो विश्व की आत्मा पर साम्राज्य प्राप्त हो जाता है। साहित्य वह जादू की लकड़ी है, जो पशुओं में, ईंट-पत्थरों में, पेड़-पौधों में विश्व की आत्मा का दर्शन करा देती है। मानव हृदय का जगत् प्रत्यक्ष जगत् जैसा नहीं है। हम मनुष्य होने के कारण मानव जगत् के प्राणियों में अपने को अधिक पाते हैं, उनके सुख-दुःख, हर्ष-विषाद से ज्यादा विचलित होते हैं। साहित्यकार का संवेदना जगत् अपेक्षाकृत विस्तार लिए होता है। सच्चे साहित्यकार का यही लक्षण है कि उसके भावों में व्यापकता हो, उसका विश्व की आत्मा के साथ ऐसा सामन्जस्य स्थापित हो गया हो कि उसके भाव प्रत्येक प्राणी को अपने ही भाव प्रतीत हों।
आदिकाल से ही मनुष्य के लिए सबसे समीप मनुष्य है। हम जिसके सुख-दुःख, हंसने-रोने का मर्म समझ सकते हैं, उसी से हमारी आत्मा का अधिक मेल होता है। विद्यार्थी को विद्यार्थी-जीवन से, कृषक को कृषक-जीवन से जितनी रूचि है, उतनी अन्य जातियों से नहीं, लेकिन साहित्य-जगत् में प्रवेश पाते ही यह भेद, यह पार्थक्य मिट जाता है। हमारी मानवता जैसे विशाल और विराट होकर समस्त मानव जाति पर अधिकार पा जाती है। मानव जाति ही नहीं चर और अचर, जड़ और चेतन सभी उसके अधिकार में आ जाते हैं। उसे मानो विश्व की आत्मा पर साम्राज्य प्राप्त हो जाता है। साहित्य वह जादू की लकड़ी है, जो पशुओं में, ईंट-पत्थरों में, पेड़-पौधों में विश्व की आत्मा का दर्शन करा देती है। मानव हृदय का जगत् प्रत्यक्ष जगत् जैसा नहीं है। हम मनुष्य होने के कारण मानव जगत् के प्राणियों में अपने को अधिक पाते हैं, उनके सुख-दुःख, हर्ष-विषाद से ज्यादा विचलित होते हैं। साहित्यकार का संवेदना जगत् अपेक्षाकृत विस्तार लिए होता है। सच्चे साहित्यकार का यही लक्षण है कि उसके भावों में व्यापकता हो, उसका विश्व की आत्मा के साथ ऐसा सामन्जस्य स्थापित हो गया हो कि उसके भाव प्रत्येक प्राणी को अपने ही भाव प्रतीत हों।